अब जंगल, झाड़ और जनजीवन सब खतरे में – पुरुँगा कोल ब्लॉक के नाम पर जिस विकास का सपना दिखाया जा रहा है, वह अब गाँवों की नींद उड़ाने लगा है। कंपनी की नज़र अब सिर्फ कोयले पर नहीं, बल्कि उस ज़मीन पर है जो पीढ़ियों से आदिवासियों की जीवन-रेखा रही है!
वन भूमि, राजस्व भूमि, और यहाँ तक कि आदिवासियों को दिये गये वन अधिकार पट्टे पत्र धारी भी अब कंपनी की जद में आ चुके हैं। छोटे-बड़े झाड़ और घने पेड़ों से सजे जंगल, जो अब तक गाँवों की सांसों का सहारा थे, उन्हें “आधारभूत संरचना के नाम पर उजाड़ने की तैयारी चल रही है।

दस्तावेज़ बताते हैं कि कंपनी अपनी खदान और उससे जुड़ी सुविधाओं — जैसे सड़कों, कार्यालयों, स्टॉकयार्ड और मशीनरी केंद्र — के लिये इन्हीं सतही जमीनों का उपयोग करेगी। यानी अब जहाँ बच्चे खेलते थे, महिलाएँ जलावन बटोरती थीं, वहीं जल्द ही भारी वाहनों का काफ़िला और खनन मशीनें दौड़ेंगी।
अगर यह खदान शुरू हुई तो गांव की शांति को पहला झटका मिलेगा
हर कुछ मिनटों में भारी ट्रकों की आवाजाही,दिन-रात गूंजती मशीनों की घरघराहट,और भूमिगत ब्लास्टिंग से थरथराती ज़मीन।जिन स्रोतों से अब तक ग्रामीणों का पीने और सिंचाई का पानी आता था, वे भी खतरे में हैं। खुदाई के चलते जल स्रोत नीचे खिसकने और कुओं और अन्य जल स्रोतों के सूखने का डर वास्तविक है।
और अगर जमीन के भीतर लगातार खुदाई जारी रही तो भू-धसान जैसी घटनाएँ आम हो जाएँगी — ज़मीन धँसेगी, खेत फटेंगे, और घरों की दीवारों में दरारें पड़ेंगी।इन सबके बीच सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या विकास के नाम पर ग्रामवासी, उनके जंगल और उनकी ज़मीन की पहचान मिटा दी जाएगी? क्या सरकार और प्रशासन यह देखेंगे कि कंपनी की मशीनें कितनी तेज़ चल रही हैं, या यह भी कि ग्रामीणों की ज़िंदगी कितनी तेज़ी से बिखर रही है! 👉 सच्चाई यह है कि अगर यह परियोजना अपने प्रस्तावित स्वरूप में लागू हुई, तो प्रभावित क्षेत्र के आसमान से न सिर्फ धूल उठेगी, बल्कि गाँव की आत्मा भी उड़ जाएगी।

