पुरुँगा कोयला खदान प्रभावित क्षेत्र में आजकल नेता दो तरह के नज़र आ रहे हैं —
पहली किस्म: “जहाँ चौपाल, वहाँ हाजिरी”
दूसरी किस्म: “जहाँ एसी, वहीं मौजूदगी”

एक पार्टी के माननीय तो हर बैठक में ऐसे सक्रिय हैं जैसे कोल ब्लॉक के गांव नहीं, उनका अपना घर खतरे में हो। कभी खेत में, कभी खदान के किनारे, तो कभी ग्रामीणों के आँगन में कुर्सी खींचकर सीधा संवाद, मानो जनता का दर्द उनका पर्सनल वाई फाई हो, हर समय कनेक्टेड।
और उधर दूसरे दल के नेताजी…
जनता के बीच जाने का नाम सुनते ही चेहरा ऐसा हो जाता है जैसे किसी ने मुफ़्त की हवा में धूल मिला दी हो!
गांव की ओर नज़र डालना तक उन्हें “पद की गरिमा के बाहर” लगता है।
ऊपर से शर्त —
“गांव की बातें गांव में नहीं, एसी रूम में सुनाएँगे… टाइम लेकर आइए।”
लगता है नेताजी का नया मंत्र है:
“जनता तक हम नहीं जाएँगे, जनता को हमें ढूंढकर आना होगा!”
ये शान का सवाल है,
या सिस्टम का सिग्नल इतना स्ट्रॉन्ग है कि जनता के कॉल रिसीव ही नहीं हो रहे?
पुरुँगा की मिट्टी उबल रही है,
पर कुछ नेता ठंडक में सेट हैं —
अख़बारों में बयान,
व्हाट्सएप्प पर सक्रिय,
और जनता के सामने “कमिंग सून ”… जैसे कोई टूटा हुआ प्रोजेक्ट! देखते हैं जनता का यह इंतज़ार ख़त्म होता है भी या नहीं ?
