मेसर्स अंबुजा सीमेंट लिमिटेड द्वारा संचालित पुरुँगा कोयला खदान परियोजना को लेकर भी स्थानीय स्तर पर अनेक तकनीकी प्रश्न उठ रहे हैं। कंपनी का दावा है कि प्रस्तावित भूमिगत खनन आधुनिक तकनीक से किया जाएगा, जिससे सतही वन क्षेत्र, जलस्रोत और आबादी पर न्यूनतम प्रभाव पड़ेगा तथा क्षेत्र के युवाओं को प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रोजगार के अवसर प्राप्त होंगे। कंपनी यह भी कहती है कि कोल ब्लॉक से प्राप्त कोयला उसके औद्योगिक संयंत्रों को ऊर्जा सुरक्षा देगा, जिससे आर्थिक गतिविधियों को गति मिलेगी और क्षेत्रीय विकास को बढ़ावा मिलेगा। पुरुँगा कोल ब्लॉक को लेकर जारी विवाद अब एक नए मोड़ पर पहुँच गया है। गाँव की महिलाएँ, बुजुर्ग और पारंपरिक आजीविका पर निर्भर समुदाय जहाँ अपने अनुभव, ज़मीन, जंगल और जलस्रोतों को बचाने की समझ के आधार पर विरोध की आवाज़ बुलंद कर रहे हैं, वहीं गाँव के शिक्षित युवा वैज्ञानिक और कानूनी तथ्यों के साथ कंपनी के दावों को चुनौती दे रहे हैं। स्थिति यह है कि कंपनी द्वारा रखे गए तर्कों पर अब युवा ऐसे तकनीकी, पर्यावरणीय और सामाजिक प्रश्न उठा रहे हैं जिनका जवाब देना कंपनी के लिए बेहद कठिन होता जा रहा है।
हालांकि, ग्रामीणों — विशेषकर शिक्षित युवा वर्ग — का कहना है कि भूमिगत खनन भी शून्य-प्रभाव वाला नहीं होता, और इसके बारे में कंपनी को अधिक पारदर्शी वैज्ञानिक डेटा प्रस्तुत करना चाहिए। युवाओं का तर्क है कि EIA रिपोर्ट में भूजल स्तर, जल निकासी, सब्सिडेंस (भूमि धंसाव), और वन्यजीव गलियारों पर प्रभाव जैसे बिंदुओं पर और विस्तृत, स्वतंत्र एवं सार्वजनिक अध्ययन की आवश्यकता है। ग्रामीणों के अनुसार, यदि खनन गतिविधि से जलस्रोत सूखते हैं या कृषि योग्य भूमि धंसाव-क्षेत्र में बदल जाती है, तो इसका सीधा और स्थायी बोझ गांवों पर पड़ेगा — जबकि लाभ मुख्यतः उद्योग के हिस्से जाएगा।
ग्रामीण यह भी सवाल उठा रहे हैं कि मेसर्स अंबुजा सीमेंट द्वारा रोजगार, पुनर्वास, राजस्व-वितरण और सामाजिक दायित्व (CSR) से जुड़े दावों का कोई समयबद्ध और कानूनी रूप से बाध्यकारी खाका अब तक सार्वजनिक रूप से ग्रामसभाओं में क्यों उपलब्ध नहीं कराया गया। युवाओं का कहना है कि किसी भी बड़े खनन प्रोजेक्ट में Impact vs Benefit का ठोस तुलनात्मक आकलन होना चाहिए — केवल आश्वासनों के आधार पर नहीं।
