धरमजयगढ़ – पुरुँगा कोल ब्लॉक परियोजना के भूमि निर्धारण रिपोर्ट ने एक बार फिर इस खदान को लेकर उठ रहे पर्यावरणीय सवालों को और गहरा कर दिया है। रिपोर्ट के अनुसार, परियोजना के कुल 868.99 हेक्टेयर क्षेत्र में से सबसे बड़ा हिस्सा वनभूमि के अंतर्गत आता है, जो परियोजना के पर्यावरणीय संतुलन पर सीधा प्रहार माना जा रहा है।

प्राप्त दस्तावेज़ बताते हैं कि पुरुँगा, कोकदार और सामररसिघा — इन तीन गाँवों की ज़मीन इस परियोजना के दायरे में आती है। इनमें से सबसे अधिक 387.01 हेक्टेयर भूमि संरक्षित वन के रूप में दर्ज है, जबकि 234.32 हेक्टेयर राजस्व वन है। यानी कुल मिलाकर लगभग 72 प्रतिशत क्षेत्र वनाच्छादित है।
इसके अलावा, 220.79 हेक्टेयर निजी भूमि और मात्र 26.89 हेक्टेयर सरकारी भूमि इस खदान के लिए प्रस्तावित की गई है। आंकड़े यह भी बताते हैं कि गाँवों में सबसे अधिक भूमि अधिग्रहण पुरुँगा में होगा, जहाँ करीब 200 हेक्टेयर से अधिक क्षेत्र को परियोजना के लिए चिन्हित किया गया है। विशेषज्ञों का कहना है कि इतने बड़े पैमाने पर वन क्षेत्र में परियोजना संचालन गतिविधियों से स्थानीय जैव विविधता, जलस्रोतों और आदिवासी ग्राम्य जीवन पर गहरा असर पड़ेगा। वहीं ग्रामीणों का आरोप है कि कंपनी ने अब तक भूमिगत खनन का दावा किया, लेकिन इसके साथ ही जमीन पर हो रही तैयारियाँ कहीं न कहीं सतही गतिविधि की ओर इशारा करती हैं।
जानकारों का मानना है कि यदि वन भूमि पर परियोजना को मंजूरी दी गई तो इस पूरे क्षेत्र का पारिस्थितिकी संतुलन बिगड़ जाएगा, जबकि शासन की ओर से अब तक इस पर स्पष्ट जवाब नहीं आया है।
👉 स्पष्ट है कि पुरुँगा कोल ब्लॉक के आँकड़े विकास और विनाश के बीच खिंची उस रेखा को उजागर कर रहे हैं, जिसे नज़रअंदाज़ करना अब नामुमकिन होता जा रहा है।
